दिन-प्रतिदिन मानवता की सिमट रही परिधि में, बिखरे पड़े रिश्तों और उनके बँटे भागों के कुछ गर्म अहसासों के संग उम्र भर की कसम झेलते, अपनों से छले गये गीतकार की संवेदना जब अपनी परिष्कृति और परिपक्वता लिए नवगीत की कंकड़ीली जमीन पर जाग्रत आत्मबोध के बीज बोता है तो आचार्य विजय गुंजन की ‘सुधियों की नागफनी’ के गीत सुगढ़ते हैं।
इनके गीतों में समकालीन यथार्थ की व्याख्या है तो मानव जीवन के अन्तर्विरोधों से उलझी गुत्थी सुलझाने की सूक्ष्म चेतना जीवन दर्शन की कलात्मकता के संग उपस्थित है, प्राकृतिक सौन्दर्य की इंद्रधनुषी छटा है तो परिवेश का उन्मत्त शोर भो चेतावनी दे रहा है। छंद का अनुशासन तो है ही अभिव्यक्ति की व्याकुलता भी है। ‘तत्समों की भ्रंस’ होती परिपाटी में ‘सिद्ध होते व्याकरण अब व्यर्थ’ का सत्य ‘आँसुओं के गीत’ लिखने और तरसते हृदय की प्रीत बनने की व्याकुलता में इन्होनें व्यापक सामर्थ्य का परिचय दिया है।
मानवीय संवेदनाओं के प्रति प्रतिबद्ध गीतकार का यह संकलन जीवन दर्शन, आत्म तत्व, व्यक्तित्व बोध, प्रीति और परिसंचय जैसी अर्हताओं संग अपनी मजबूत उपस्थिति की घोषणा करता है।
– श्री अनिल कुमार झा



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