डॉ. अभिज्ञात हिन्दी के एक सशक्त और स्थापित हस्ताक्षर हैं, जिनका यह चौथा कहानी संग्रह मानव समाज की हिंसक प्रवृत्तियों और खौफनाक सच्चाइयों को बेनकाब करता है। नौ कहानियों और दो लघुकथाओं के इस संकलन में लेखक ने एडगर एलन पो जैसी रहस्यमयी और रोमांचक शैली का प्रयोग किया है, जो हिन्दी की पारंपरिक यथार्थवादी धारा से अलग पाठकों के भीतर एक ‘बुरे दुःस्वप्न’ जैसी झनझनाहट छोड़ जाती है। जहाँ ‘अपने पापा जी’ जैसी कहानी सांप्रदायिक तनाव में मानवीय मूल्यों की रक्षा करती है, वहीं ‘दलदल’ और ‘आदमखोर’ जैसी लंबी कहानियाँ मनुष्य के भीतर छिपे अपराधी और भ्रष्ट चरित्र को पूरी बेबाकी से उघाड़ती हैं। ‘दिनांत’ जैसी कहानियों के माध्यम से जीवन के संघर्ष और समाज के बदलते व्यवहार को भी बखूबी उकेरा गया है। अभिज्ञात की लेखनी में सामाजिक सरोकार और कलात्मकता का अद्भुत संगम है, जो हर कहानी को एक प्रभावशाली साहित्यिक कृति में बदल देता है।
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जब चाहो मुझे पुकारना / डॉ. अभिज्ञात
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| Author | डॉ. अभिज्ञात |
|---|---|
| Format | Hardcover |
| ISBN | 978-93-47306-22-8 |
| Language | Hindi |
| Pages | 136 |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |
| Genre | कहानी |
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