बाल कुंडलियाकार अनिल कुमार दूबे ने अपने छंदों के माध्यम से जो शब्दचित्र उकेरे हैं वे न केवल प्रभावशाली बन पड़े हैं अपितु बालमनोविज्ञान के अनुरूप भी हैं। एक बच्चा बाह्यजगत से प्रभावित होकर क्या-क्या कल्पनाएँ करता है तथा किस प्रकार के विचार उसके मानस पटल को उद्वेलित करते हैं ‘गोलू-मोलू की कुण्डलियाँ’ के छंद इसका जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
बच्चों की बात को बच्चों की भाषा में कहना कठिन कार्य होता है लेकिन अनिल दूबे जी के छंदों को पढ़कर ऐसा लगता है कि उन्होंने सहज रूप में बालमन की भावाभिव्यक्ति की है। उन्हें बच्चों की बात कहने में किसी अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ी है। यह कवि की काव्य प्रतिभा का परिचायक है।
– डॉ. बिपिन पाण्डेय



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