समकालीन हिन्दी गद्य में वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकार के साथ लिखी गई रचनाएँ विरल होती जा रही हैं। ऐसे समय में भगवान प्रसाद सिन्हा की पुस्तक ‘बेतरतीब’ एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में हमारे सामने है। यह संग्रह भले ही विषयों में विविध हो, किंतु अपनी वैचारिक दिशा में पूर्णतः सुसंगत और स्पष्ट है।
‘बेतरतीब’ समाज, राजनीति, इतिहास और संस्कृति पर लिखे गए लेखों और टिप्पणियों का ऐसा संकलन है, जो पाठक को सोचने और प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है। सामाजिक न्याय, वामपंथी राजनीति, धर्म, साम्प्रदायिकता, लोकतंत्र और पूँजीवादी व्यवस्था पर लेखक का दृष्टिकोण निर्भीक और जनपक्षधर है। पुस्तक में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों, जनआन्दोलनों और समकालीन राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण सत्ता-केंद्रित इतिहास के बजाय जनता के संघर्षों के आलोक में किया गया है। पुस्तक में वर्तमान समय की महत्तवपूर्ण साहित्यिक रचनाओं और पुस्तक की समीक्षा इसे साहित्यिक पाठकों के लिए भी उपयोगी बनाती है। लेखों, टिप्पणियों, संस्मरणों और वैचारिक आलेखों का यह संग्रह अपने आप में अनूठा है।
‘बेतरतीब’ जागरूक पाठकों, विद्यार्थियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े पाठकों के लिए एक उपयोगी पुस्तक है।




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