पारिजात का फूल चुपचाप अपनी सुगंध छोड़ जाता है। डॉ. बैजन्ती कुमारी के कविता-संग्रह ‘पारिजात : मन की अनुगूँज’ में भी मन के ऐसे ही अनेक भाव शब्द पाते हैं। सुबह का उजाला, पेड़ का जीवन, माँ-पिता का स्नेह और लेखनी से कवयित्री का आत्मीय संबंध इन कविताओं में अपने सहज रूप में उपस्थित हैं।
इन रचनाओं में जीवन के प्रति आस्था है, तो आसपास घट रहे परिवर्तनों को लेकर चिंता भी। कवयित्री संबंधों में कम होती आत्मीयता को देखती हैं, मनुष्य के आचरण पर प्रश्न करती हैं और प्रकृति के प्रति अपने दायित्व की याद दिलाती हैं। उनकी कविता पाठक से दूर खड़े होकर बात नहीं करती; वह घर, परिवार और समाज के परिचित अनुभवों से संवाद आरंभ करती है।
| Author | डॉ. बैजन्ती कुमारी |
|---|---|
| Format | Paperback |
| ISBN | 978-81-68494-43-5 |
| Language | Hindi |
| Pages | 104 |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |
| Genre | कविता |



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