चर्चित कवि शिवनारायण के दोहों का दूसरा संग्रह ‘मंदार पर चाँद’ सामने है, जिसमें समय, समाज, संस्कृति, नीति, प्रेम आदि से संबंधित दोहे प्रभावित करते हैं। अपने पहले ही दोहा-संग्रह ‘धार के आर-पार’ से उन्होंने भाव-संप्रेषण में भाषा-व्यवहार को लेकर अपना लोहा मनवा लिया। इस संग्रह में भी उनकी भाषा-साधना का चमत्कार अपना प्रभाव छोड़ता है। शिवनारायण अपने अनुशासन के सधे आलोचक हैं, किन्तु उनका मन कविताओं में रमता है।
दोहा साहित्य की प्राचीन विधा होते हुए भी समकालीन चुनौतियों से होड़ लेता है। धर्मनिरपेक्ष समरस समाज की संकल्पना में जीते शिवनारायण के दोहे इसकी तसदीक़ करते हैं, जब वे कहते हैं—
‘सब सभी का ध्यान रखें, ऐसा बने समाज/
लक्ष्य हमारा है यही, देश हमारा ताज’
अथवा
‘युद्ध नहीं प्रेम चाहिए/ पृथ्वी में चहुँ ओर/
युद्ध का व्यापार नहीं, रहे शांति सब छोर’
या फिर
‘युद्ध-युद्ध जो कर रहे, ठोकर उसको मार/
फूलों के इस देश में, दे उसको तू हार!’
इन दोहों में गाँव की मनहर छवि भी देखने को मिल जाएगी—
‘पगडंडी से जा रहे, अपने-अपने गाँव/
छटा निराली गाँव की, कहती बैठो छाँव!’
यही समरस भाव हमें समय-संस्कृति से जोड़ता है।
समय, संस्कृति और समरस समाज से जोड़ते शिवनारायण के दोहे गुदगुदाते हुए हमें जीवन में रचनात्मक संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं। मुझे विश्वास है कि शिवनारायण के रससिद्ध दोहे पाठकों को पसंद आएँगे।
– अनिरुद्ध सिन्हा



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