या देवी सर्वभूतेषु… (कुंडलिया प्रबंध-काव्य) / ऋता शेखर ‘मधु’

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‘या देवी सर्वभूतेषु…’ केवल एक काव्य-पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय सनातन आध्यात्मिक परम्परा और देवी-तत्त्व की महिमा का छंदबद्ध काव्यानुवाद है। ऋता शेखर ‘मधु’ ने दुर्गा सप्तशती के संस्कृत श्लोकों में निहित भावों को कुण्डलिया छंद में इस प्रकार रूपायित किया है कि मूल कथा की गरिमा अक्षुण्ण रहते हुए वह सामान्य हिन्दी पाठकों के लिए सहज, 100सरस और गेय बन उठी है। यह कृति देवी दुर्गा के शौर्य, करुणा, मातृशक्ति और धर्मसंरक्षण की उस शाश्वत परम्परा का काव्यमय स्मरण कराती है, जो असत्य पर सत्य तथा अधर्म पर धर्म की विजय का सनातन उद्घोष है।

पुस्तक में बीजमंत्र, दुर्गा कवच, अर्गलास्तोत्र, कीलक, चण्डीशाप विमोचन, दुर्गा सप्तशती के तीनों चरित्र, सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र, प्रधानिक रहस्य, क्षमा प्रार्थना, आरती तथा ‘नारी है देवी का रूप’ जैसे महत्त्वपूर्ण प्रसंगों को क्रमबद्ध रूप में समाहित किया गया है। प्रत्येक प्रसंग में कुण्डलिया छंद की लयात्मकता, भावप्रवणता और कथात्मक प्रवाह एक साथ उपस्थित हैं, जिससे यह कृति श्रद्धा, साधना और साहित्य—तीनों का सुंदर संगम बन जाती है। संस्कृत से अपरिचित पाठकों के लिए यह पुस्तक देवी-माहात्म्य को समझने और भावपूर्वक आत्मसात करने का एक सुलभ माध्यम सिद्ध होती है।

आस्था और काव्य-कौशल का यह समन्वित रूप इस पुस्तक को केवल धार्मिक ग्रंथ का रूपांतरण नहीं रहने देता, बल्कि इसे आधुनिक हिन्दी में कुण्डलिया छंद की संभावनाओं का एक उल्लेखनीय उदाहरण भी बनाता है। देवी-उपासना, भारतीय सांस्कृतिक चेतना और छंद-साहित्य में रुचि रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए यह कृति समान रूप से संग्रहणीय, पठनीय और प्रेरणास्पद है।

Author

ऋता शेखर ‘मधु’

Format

Paperback

Language

Hindi

Pages

100

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

खंड काव्य

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