विश्वामित्र / सुलेखा झा

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साहित्यिक परंपरा में हमारे ऋषि-मुनियों को देखने के दो तरीके प्रचलित हैं। एक उन्हें कामान्ध, लोभी, विषयसिक्त सिद्ध करना और दूसरा उनके उत्तम कार्यों के साथ उनकी मानवीय बुराइयों के प्रति उदार रहना। किसे क्या अच्छा लगता है ये सोच कर लिखना साहित्यकार का काम नहीं है, न होना चाहिए। उसे अपनी बात तर्कपूर्ण और विवेक सम्मत ढंग से रखनी चाहिए। इस लिहाज़ से ये कृति अच्छी बन पड़ी है। वे पूर्वाग्रहों से विश्वामित्र को मुक्ति दिलाती हैं और सिद्ध करती हैं कि इतिहास में अन्याय पुरुषों के साथ भी हो सकता है और उन्हें समझने में भी भूल हो सकती है।
पहली ही कृति में विश्वामित्र जैसे पात्र को चुनना और उसे खंडकाव्य में दोहों में प्रस्तुत करना किसी भी लेखक के लिए चुनौती है। सुलेखा जी ने न सिर्फ ये चुनौती स्वीकारी है बल्कि उसमें पूरी तरह से सफल हुई हैं।

-वंदना बाजपेयी

Author

सुलेखा झा

ISBN

978-93-49136-80-9

Language

Hindi

Pages

96

Format

Paperback

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

दोहा

3 reviews for विश्वामित्र / सुलेखा झा

  1. Rated 5 out of 5

    Pankaj Kumar (verified owner)

    बेहतरीन प्रयास, सुंदर लेखन

  2. Rated 5 out of 5

    Rupesh Kumar

    Is verry good book

  3. Rated 5 out of 5

    Rupesh Kumar

    Bahut accha

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