‘गीत-अगीत कौन सुंदर है’: दिनकर ने कभी इस तरह इस पूरे विवाद पर चुटकी ली थी और मनहर ढंग से इंगित किया था कि किसी भी शिल्प में जीवन की विडम्बनाएँ करीने से कौंध सकती हैं।
पूनम जी के ये गीत कलरव की तरह सहज हैं। जीवन-जगत की विसंगतियां संवेदनशील चित्त में आंदोलन जगाते हैं, और वंचितों के पक्ष में खड़ी स्त्री कभी मिथकों के द्वार जाती है, कभी इतिहास-दर्शन के कि कहीं कुछ तो कुछ समाधान सूझे। प्रकृति से गीतकार ने अनेक बिंब लिए हैं और जनजीवन से भी।
– अनामिका



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