‘सोच का मौसम’ हरेराम समीप जी की ग़ज़लों का समग्र कोष है। वे कहते हैं- ‘मेरे लिए ग़ज़ल का मूल तत्व उसमें निहित सांकेतिकता है। दूसरी बात यह कि वर्तमानता मेरी ग़ज़लों का बीजतत्व है, जिनमें जीवन के नए यथार्थ की परख भी है और उन जीवन-सत्यों का उद्घाटन भी है, जो मनुष्य की बेहतरी के लिए जरूरी हैं और जिनसे मनुष्य लगातार वंचित किया जा रहा है। आज ये जो भयावह स्थितियाँ हमारे सामने हैं, जहाँ सृजन पर विध्वंस का आक्रमण हो रहा हो, सरंक्षण से अधिक विनाश की शक्तियाँ बलवती हो रही हों, छल, कपट, घृणा, आतंक और क्रूरता मूल्यों में बदल रही हों, जहाँ जीवन पर जमा हमारा दृढ़ विश्वास दरकने लगा हो, आस्थाएँ खंडित हो रही हों और बाज़ार तथा कट्टरता ने बर्बरता की सभी सीमाएँ लाँघ दी हों, तब ये ग़ज़लें इन क्रूर वास्तविकताओं की पड़ताल करते हुए अपने समय से टकराना चाहती हैं और पूरी शक्ति से मानवता की रक्षा भी करना चाहती हैं। मेरे विचार से यही है-आज की ग़ज़ल का नया तेवर।’
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| Author | हरेराम समीप |
|---|---|
| Format | Hardcover |
| ISBN | 978-93-47306-63-1 |
| Language | Hindi |
| Pages | 456 |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |
| Genre | ग़ज़ल |




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