नंदन वन का देवता / सम्पादक : प्रो. अनिल सिंह ‘सत्यप्रिय’

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‘नंदन वन का देवता’ प्रो. रामस्वरूप जैसे शांत, अंतर्मुखी, अनुशासनप्रिय और आध्यात्मिक व्यक्तित्व की अद्वितीय जीवन-यात्रा का सचित्र दस्तावेज़ है। सीधी जिले के चोरगड़ी जैसे छोटे से गाँव से उठकर मध्यप्रदेश के श्रेष्ठ शिक्षक, चिंतक और बाद में आध्यात्मिक मन:भूमि के साधक बनने तक की यह कहानी केवल एक मनुष्य की जीवनी नहीं, बल्कि उस चेतना पुरुष की अप्रतिम गाथा है जिसने सादगी, दृढ़ता, सत्यनिष्ठा और मानवीय करुणा को अपने जीवन का आधार बनाया।
गरीबी में जन्मे रामस्वरूप जी का व्यक्तित्व बचपन से ही अलग था- शांत, जिज्ञासु, अध्ययनशील और गहरे आत्मबल वाला। जबलपुर के गन कैरेज फ़ैक्ट्री स्कूल से पढ़ाई शुरू करने वाले इस सरल बालक ने शिक्षा को साधन नहीं, बल्कि साधना के रूप में स्वीकार किया। प्रथम श्रेणी में परीक्षाएँ उत्तीर्ण करना, आचार्य रजनीश जैसे अद्वितीय दार्शनिक का सान्निध्य पाना और फिर भूगोल विषय में प्रावीण्य सूची में स्थान पाना-ये सब उनके भीतर जल रही उस ज्योति के प्रमाण हैं जिसके सहारे उन्होंने जीवन पथ को प्रकाशित किया।
काॅलेज की नौकरी छूटना, संघर्षों से गुज़रना, फिर महाविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी पाना और शून्य से उठकर पुनः आगे बढ़ना एवं बढ़ते रहना उनकी पहचान है। रामस्वरूप जी की जीवन यात्रा बताती है कि सच्चे कर्मयोगी परिस्थितियों से नहीं टूटते। उच्च शिक्षा विभाग में वर्षों तक ईमानदारी और अद्भुत अनुशासन के साथ कार्य करते हुए उन्होंने अपने आप को कभी समझौते में नहीं झोंका। ‘गधे को कभी बाप नहीं कहा’- उनका यह कथन उनके चरित्र की रीढ़ है।
जीवन को प्रकाशित करने वाले ब्रह्मसूत्र, भगवदगीता, उपनिषद, बुद्ध, कबीर, श्री अरविंद और ओशो के चेतना विचार उनके जीवन का आंतरिक आधार बने। यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व धीरे-धीरे एक शिक्षक की सीमाओं से आगे बढ़कर एक चिंतनशील मार्गदर्शक, एक शांत साधक और एक अंतर्मुखी तीर्थ में बदल गया।
प्रो. शिवकुमार तिवारी जैसे विलक्षण मित्रों की आत्मीय संगति, शिक्षा गुरु आचार्य रजनीश ‘ओशो’ का जीवन्त तार्किक विश्लेषण, दीक्षा गुरु पंडित रामाधार शास्त्री जी का आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सीधी की सिद्धभूमि ने उनके भीतर एक ऐसी पवित्रता और निस्पृहता का विकास किया, जिसे संपादक ने ‘नंदन वन का देवता’ कहा है। उनका मानना है, “मैं नंदन वन के देवताओं को तो कभी नहीं देखा। शायद नंदनवन में जाने और वहां के देवताओं से मिलने का संयोग भी न बने, लेकिन मेरे लिए प्रो. रामस्वरूप ही नंदन वन के देवता हैं । देवता का आशय मेरे लिए पूजनीय एवं अनुकरणीय व्यक्तित्व है जिसमें रचनात्मक दिशा निर्देशन की क्षमता है। छप्पन भोगों को भोगने वाला, सुरापान करने वाला एवं अप्सराओं के नयनों के बाण से घायल व्यक्ति मेरे लिए कभी देवता हो ही नहीं सकता है। धिक्कारता हूं ऐसे देवता को। मुझे तो रामत्व को धारण करने वाला परोपकारी पुरुष चाहिए। ये गुण रामस्वरूप जी में हैं। यह नाम उनके हाड़-मांस वाली देह पर ख़ूब फबता है। वे सही मायने में रामस्वरूप हैं।”
यह पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं- एक साधना है, एक प्रवाह है, एक ऐसा दर्पण है जिसमें पाठक स्वयं को भी देख सकेंगे। यह जीवन के उन मूल्यों की कहानी है जो आज दुर्लभ हो चुके हैं, परंतु जिनकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

-शारदा सुमन
संयुक्त निदेशक. कविता कोश,
प्रबंध निदेशक. श्वेतवर्णा प्रकाशन

Author

सं. प्रो. अनिल सिंह ‘सत्यप्रिय’

Format

Hardcover

ISBN

978-93-47306-93-8

Language

Hindi

Pages

180

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

जीवनी

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