लोर कै गंगोतरी / हरीराम मिश्र

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महाभारत के महत्त्वपूर्ण पात्र कुंती के दर्द की महागाथा है ‘लोर कै गंगोतरी’। कुंती केवल काव्य की सन्दर्भ नहीं, हृदय की संवेदनात्मकता की भी सन्दर्भ है। सनातन की सांस्कृतिक पूँजी दयामयी एवं करुणामयी है। क़त्लगाह एवं निष्ठुरता की प्रतिमा बनना उसका कार्य नहीं है। जिस सनातन की सांस्कृतिक पूँजी से जुड़ा एक ऋषि अचानक क्रौञ्च-बध से भावाविल होकर महाकवि हो जाता है, जिस सनातन की पूँजी से सिद्धार्थ नामक राजकुमार करुणावतार गौतम बुद्ध बन जाता है, जिस सनातन की उदारवादी सांस्कृतिक पूँजी से जुड़ा अन्धे माता-पिता की काँवर ढोने वाला श्रवण कुमार मातृ-पितृभक्ति के उदाहरण का एक हिस्सा बन जाता है, जिस सनातन संस्कृतिक के विराट औदार्य से जुड़ा अयोध्या का राम जैसा राजकुमार पिता की आज्ञा पर वनवासी बन जाता है उसी सनातन की पूँजी से जुड़ी कुंती नामक यह राजमहिला कर्ण को नदी में प्रवाहित करने के बाद बाण बिंधी हिरनी सी छटपटाती है किन्तु अपना यह दर्द किसी से कह नहीं पाती। विवाह के बाद अपने पाँच पुत्रों को लोक-लाज वश यह भी नहीं बता पाती कि उनका एक सबसे बड़ा भाई कर्ण है।
ये सारे सन्दर्भ कुंती की व्याकुलता के विषय हैं। कविवर हरीराम मिश्र कुंती के इन संवेदनात्मक स्वर-संवादों को आत्मसात करते हुए काफी करुणाविल होते हैं और कुंती को काव्य की माला पहनाने के लिए, उसे अपनी काव्यात्मक श्रद्धांजलि देने के लिए माँ सरस्वती के दरबार में जाते हैं और सरस्वती उन्हें कुंती पर लिखने के लिए संस्तुति प्रदान करती हैं।

Author

हरीराम मिश्र

Format

Paperback

Language

भोजपुरी

ISBN

978-93-49136-97-7

Pages

108

Genre

कविता

Publisher

Shwetwarna Prakashan

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