कुछ अन-कही (Kuchh An-Kahi / Sumit Agrawal)

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जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह संग्रह उन अनकहे एहसासों और जज़्बातों की आवाज़ है जो दिल तक तो आते हैं, मगर ज़ुबाँ या पन्नों तक नहीं पहुँच पाते। लेखक स्वयं कहते हैं कि यह उन लम्हों की आवाज़ है जिन्हें उन्होंने जिया तो सही, पर कह नहीं पाए, जिनमें कुछ ख़ामोश दर्द, कुछ अधूरी मोहब्बतें और कुछ ठहर गए रिश्ते शामिल हैं।
संग्रह की सबसे बड़ी ख़ूबी इसकी ईमानदारी और सादगी है। सुमित अग्रवाल ने इन ग़ज़लों को लिखते समय किसी पाठक की कल्पना नहीं की, बल्कि ख़ुद से ही बात की है, जिसके कारण हर शेर दिल की गहराइयों को छूता है।
‘कुछ अनकही’ में प्रेम और श्रृंगार के साथ-साथ मानव जीवन के द्वंद्वों और सामाजिक विसंगतियों की झलक भी मिलती है। ग़ज़लें सुख-दुख, आशा-निराशा, और जीवन-मृत्यु के संघर्ष को समेटे हुए हैं। लेखक ने आधुनिकता की दौड़, भौतिक सुखों की आपाधापी, रिश्तों के अवमूल्यन, और ग्रामीण जड़ों से दूर होते जाने के दर्द को भी बड़ी संवेदनशीलता से उभारा है।
कुल मिलाकर, ‘कुछ अनकही’ एक ऐसी भावपूर्ण कृति है जो अपने सीधे, सरल शब्दों में जीवन के विराट और गहन सत्य को समेटे हुए है। यह उन सभी दिलों की आवाज़ है जिसने किसी अनकही को अपने अंदर संजो रखा है। यह ग़ज़ल-संग्रह यकीनन हर संवेदनशील पाठक को एक नया उजास और हौसला प्रदान करता है।

Author

सुमित अग्रवाल

Format

Paperback

ISBN

978-93-49947-52-8

Language

Hindi

Pages

144

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

ग़ज़ल

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