स्त्री-पुरुष के प्रेम सम्बन्धों पर आधारित समकालीन लघुकथाओं के इस संकलन ‘कोई नाम न दो’ के प्रकाशन का उद्देश्य बहुआयामी है। प्रेम का प्रत्यय सार्वभौमिक प्रत्यय है। प्रेमशून्यता की स्थिति में सूरज का दमकना, चाँद का चमकना तथा तारों का टिमटिमाना व्यर्थ हो जायेगा। जीवन में प्रेम की यथार्थता को समझते हुए अक्सर यह समझ में आता है कि हम स्त्री-पुरुष के प्रेम में केवल आकर्षण या कल्पना को ही प्रेम मान लेते हैं, जबकि सच्चा प्रेम स्वीकृति, सम्मान और साथ निभाने की गहरी प्रतिबद्धता में प्रकट होता है, जहाँ अहंकार नहीं, आत्मीयता बोलती है। एक स्त्री और एक पुरुष के मध्य प्रेम-सम्बन्धों की गहन जटिलताओं को सहजता से जीने और समझने की आवश्यकता है, ताकि यह जगत् अधिक सुन्दर और औचित्यपूर्ण हो सके।
– सं. डॉ. शैलेश गुप्त ‘वीर’



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