ख़यालों में कई परछाइयाँ हैं / डॉ. नीलम श्रीवास्तव

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बिहार की चर्चित ग़ज़लकार नीलम श्रीवास्तव ने अपनी ग़ज़लों में सार्थक पठनीयता को बरकरार रखा है। इस संग्रह की ग़ज़लें आश्वस्त करती हैं। इनमें समकालीन विसंगतियों, प्रतिरोधी सोच का एक नया आयाम उद्घाटित होता है। नीलम जी विसंगतियों को सीमित करके नहीं देखतीं बल्कि उन्हें व्यापक परिप्रेक्ष्य और समग्रता में समझने पर बल देती हैं।
नीलम श्रीवास्तव अति संवेदनशील हैं। इनकी संवेदना मात्र कुछ व्यक्ति विशेष या क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि इनकी संवेदना के दायरे में सम्पूर्ण समाज आता है। इनकी संवेदना न तो भटकती है और न ही स्थानच्यूत होकर, आम की बजाय ख़ास में केंद्रित हो जाती है। यही कारण है कि संग्रह की ग़ज़लें बेहतर से बेहतर बन पड़ी हैं। कालगत संघर्ष, आत्मसंघर्ष के प्रभाव भीतरी परतों तक ग़ज़लों में सहज ढंग से अभिव्यक्त हुए हैं। इनकी भाषा में जो व्यग्रता, दग्धता और विक्षोभ चित्र हैं वे समकालीन हिंदी ग़ज़लों के मानकों पर सही उतरते हैं। बहर का निर्वाह भी सही-सही हो पाया है। इनकी ग़ज़लें दो स्तरों पर चलती हैं। एक तरफ़ जीवन है तो दूसरा उसका यथार्थ भी पीछे-पीछे चलता है। यही इनका परिवेश और इनकी संचित स्मृतियों की सबसे बड़ी पूँजी है।
इस प्रकार हम पातें हैं कि नीलम श्रीवास्तव की ग़ज़लें ग़ज़ल के भाव तथा कलापक्ष दोनों के प्रति सजग और सचेष्ट हैं।

– अनिरुद्ध सिन्हा
गुलज़ार पोखर, मुंगेर (बिहार) -811201

Author

डॉ. नीलम श्रीवास्तव

Format

Paperback

ISBN

978-93-49947-70-2

Language

Hindi

Pages

126

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

ग़ज़ल

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