‘हिन्दी ग़ज़ल के पचास साल’ हिन्दी ग़ज़ल की उस सृजनात्मक यात्रा का दस्तावेज़ है, जिसने देवनागरी लिपि में लिखी जा रही ग़ज़ल को संशय, उपेक्षा और तुलना के दौर से निकालकर एक सशक्त, आत्मविश्वासी और सामाजिक रूप से उत्तरदायी विधा के रूप में स्थापित किया। ज्ञानप्रकाश विवेक द्वारा संपादित यह ग्रंथ दुष्यंत कुमार के बाद से लेकर समकालीन समय तक फैली हिन्दी ग़ज़ल की निरंतर विकसित होती परंपरा, उसके तेवर, उसकी भाषा, उसके विषय-विस्तार और उसके सौंदर्यबोध को समग्रता में प्रस्तुत करता है।
पुस्तक में हिन्दी ग़ज़ल के विभिन्न चरणों—गीतात्मक प्रभाव, प्रतिवादी स्वर, सामाजिक यथार्थ, आंतरिक संवेदना, प्रकृति-बोध, स्त्री-विमर्श और नए समय की विडंबनाओं—का विवेचन करते हुए वरिष्ठ और युवा रचनाकारों की प्रतिनिधि उपस्थिति दर्ज की गई है। यह संकलन बताता है कि हिन्दी ग़ज़ल ने उर्दू ग़ज़ल की शास्त्रीय विरासत (क़ाफ़िया, रदीफ़, बहर) को आत्मसात करते हुए प्रेम के सीमित दायरे से आगे बढ़कर समाज, अवाम और समय को अपने केंद्र में रखा और अपनी अलग पहचान गढ़ी।
यह पुस्तक केवल नामों या रचनाओं की सूची नहीं, बल्कि पचास वर्षों में हिन्दी ग़ज़ल द्वारा अर्जित संवेदनात्मक गहराई, भाषिक प्रयोगशीलता और वैचारिक विस्तार का साक्ष्य है। शोधार्थियों, आलोचकों, रचनाकारों और ग़ज़ल-प्रेमियों के लिए यह कृति हिन्दी ग़ज़ल के विकासक्रम को समझने और उसके वर्तमान व भविष्य को पढ़ने का एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है।



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