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हिन्दी ग़ज़ल का युगबोध / डॉ. भावना

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‘हिन्दी ग़ज़ल का युगबोध’ समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के बदलते स्वर, संवेदना और वैचारिक विस्तार को रेखांकित करने वाली एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति है। डॉ. भावना की पूर्ववर्ती चर्चित पुस्तक ‘हिन्दी ग़ज़ल के बढ़ते आयाम’ के बाद यह पुस्तक हिन्दी ग़ज़ल की इक्कीसवीं सदी की चेतना, उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों तथा समकालीन सरोकारों को नए दृष्टिकोण से समझने का गंभीर प्रयास करती है। प्रस्तुत पुस्तक में संकलित आलेख यह प्रमाणित करते हैं कि हिन्दी ग़ज़ल अब केवल भावुक अभिव्यक्ति की विधा नहीं रह गयी है, बल्कि वह समय की जटिलताओं, मनुष्य की बेचैनियों और बदलते वैश्विक परिदृश्य की सशक्त अभिव्यक्ति बन चुकी है।
इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें हिन्दी ग़ज़ल को वर्तमान समय की बहुआयामी चुनौतियों और प्रश्नों के संदर्भ में देखा गया है। वैश्विक संकट, पर्यावरण, महामारी, अस्मिता-संघर्ष, किसान-जीवन, भाषाई संकट, तकनीक, सामाजिक विषमता, आतंकवाद तथा मानवीय मूल्यों के क्षरण जैसे विषयों को हिन्दी ग़ज़ल के माध्यम से विश्लेषित करते हुए लेखिका ने यह स्थापित किया है कि ग़ज़ल आज के समय की सबसे सजग और प्रभावी साहित्यिक विधाओं में से एक है। पुस्तक के आलेखों में ग़ज़ल की परम्परा, संरचना, विकास-यात्रा और उसके बदलते तेवरों पर गंभीर विमर्श उपस्थित किया गया है, जो हिन्दी ग़ज़ल की व्यापक संभावनाओं को उद्घाटित करता है।

Author

डॉ, भावना

Format

Hardcover

ISBN

978-81-69342-73-5

Language

Hindi

Pages

144

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

आलोचना

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