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हिन्दी ग़ज़ल का वर्तमान / हरेराम समीप

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दुष्यंत के बाद से अब तक हिन्दी ग़ज़ल बड़े सधे हुए ढंग से जीवन के यथार्थ की परख भी कर रही है और उन जीवन-मूल्यों को उजागर भी कर रही है, जो मनुष्य की बेहतरी के लिए ज़रूरी हैं, और जिनसे उसे वंचित किया जा रहा है। इन पाँच दशकों में हिन्दी ग़ज़ल ने अपने रचनात्मक विकास के कई नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इतने कम समय में कोई विधा कभी इतनी लोकप्रिय नहीं हो पाई है, जितनी हिन्दी ग़ज़ल हुई है।

आज हिन्दी ग़ज़ल के मुख्य सरोकार विसंगतियों और विडम्बनाओं को उजागर करना है, अमानवीयता का प्रतिकार करना है तथा यथास्थिति को बदलना है। वह अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद आमजन की परेशानी, संत्रास, कुंठा, संघर्ष और शोषण के विरुद्ध स्वर दे रही है, अपने अतीत की व्याख्या कर रही है, अपने वर्तमान से जिरह कर रही है और नए ज़माने की प्रस्तावनाएँ गढ़ रही है…

पुस्तक में चयनित इन 51 ग़ज़लकारों की ग़ज़लों के द्वारा मैं पिछले तीन वर्षों से ‘हिन्दी ग़ज़ल के वर्तमान’ का अध्ययन कर रहा था, किन्तु दुर्भाग्यवश इस दौरान ग़ज़लकार ज़हीर कुरैशी जी, हस्तीमल हस्ती जी, अश्वघोष जी और हाल ही में शताब्दी-पुरुष रामदरश जी हमसे बिछड़ गए। उनकी स्मृतियाँ आज भी जीवंत हैं, इसीलिए मैं श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें पुस्तक में पूर्ववत स्थान दे रहा हूँ।

हरेराम समीप

Author

हरेराम समीप

Format

Hardcover

ISBN

978-93-47306-09-9

Language

Hindi

Pages

632

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

आलोचना

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