आज दुष्यंत के एकमात्र ग़ज़ल-संग्रह ‘साए में धूप के’ प्रकाशन के 50 वर्ष हो गए हैं। या यूँ कहें कि हिंदी गज़ल के अपने नए लिबास में आए 50 वर्ष हो चुके हैं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इन 50 वर्षों में हिंदी गज़ल कितनी सशक्त हुई है? उसके कथ्य, बिम्ब और मुहावरों में कितना बदलाव हुआ है? ग़ज़लकारों ने ग़ज़लियत को बरकरार रखते हुए अपने कथ्य के स्तर पर कितना नया प्रयोग किया है? आदि…आदि। ऐसे अनेक सवाल सबके जेहन में स्वाभाविक रूप से आते हैं। मैंने अपनी सामर्थ्य की सीमा में इसे जाँचने और परखने की कोशिश की है। इसे दूसरे शब्दों में कहूँ, तो मेरी यह पुस्तक हिंदी ग़ज़ल की नवीन भाषा शैली और उसकी पड़ताल करने की चेष्टा भर है। इस संग्रह में ऐसे ग़ज़लकारों का चयन किया गया है जिनका ग़ज़ल या साहित्य के साथ अनुभव भले ही पुराना रहा है लेकिन उनके संग्रह इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक में प्रकाशित हुए हैं। मैंने इस संग्रह में अपने अनुभव के साथ नवीनता को आत्मसात करने वाले इन दस रचनाकारों की भाषा शैली, कहने का अंदाज़, परिवेश जनित चिंतन, सामाजिकता, संघर्षधर्मिता और लेखन की प्रतिबद्धता को समझने की कोशिश की है। इस पुस्तक में जिन ग़ज़लकारों पर बात की गई है वे हैं— रवि खण्डेलवाल, शिवनारायण, डॉ. अमर पंकज, डॉ. राकेश जोशी, धर्मेन्द्र गुप्त साहिल, राम नाथ ‘बेखबर’, विकास, के. पी अनमोल, मनोज अहसास एवं राहुल शिवाय।
| Author | Dr. Bhavna |
|---|---|
| Format | Hardcover |
| ISBN | 978-93-49947-27-6 |
| Language | Hindi |
| Pages | 216 |
| Genre | आलोचना |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |




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