गीत हूँ मैं / यशपाल सिंह ‘यश’

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विषय वैविध्य और लोकोन्मुखी भाव से सम्पृक्त गीत संग्रह ‘गीत हूँ मैं’ यशपाल यश की दृष्टि सम्पन्नता का परिचायक है। उनके गीतों में युग बोध का शाश्वत भाव है जो सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की स्थापना करता है। उनके गीत कोलाहल को नहीं ढोते बल्कि सार्थक अनुनाद का प्रक्षेपण कर मानव संस्कार को अभिसिंचित करते हैं, जिनके स्पर्श से मन की सुप्त संवेदनाएँ स्वतः जागृत हो जाती हैं। अनुभूतियों के व्यापक धरातल पर इन गीतों में निहित अत्यंत सूक्ष्म संवेदनाओं को महसूस किया जा सकता है।
यश जी के गीत वस्तुतः सांस्कृतिक एवं सामाजिक अंतर्वस्तुओं का सूक्ष्म निरूपण हैं, जो मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर उगते हैं। गीतों में समय के कोलाहल की व्याकुलता है जो सामाजिक विषमताओं, अपसंस्कृति, पर्यावरण, विध्वंसकारी प्रवृत्तियों एवं मनुष्य के दोहरे चरित्र पर प्रश्न करती हैं। संवेदन की सहजता और तरलता को लुप्त नहीं होने देने की ज़िद और सामाजिक चिंतन का आग्रह यश जी के गीतों की विशेषता है। समय के बदन पर उगे हुए सामाजिक विडंबनाओं के घाव, स्वार्थ के अग्निकुंड में विसर्जित होती हुई मानवीय संवेदनाएँ, व्यवस्था के अंधेपन की गूँगी सच्चाई, कच्ची सड़कों पर टहलते हुए शहर के डरावने पाँव, तंत्र की संवेदनहीनता और नैतिक प्रदूषण उनके गीतों की साँसों में प्रतिध्वनित होते हैं। गीतों में अनुस्यूत यथार्थवादी स्पन्दन गीत की गरिमा को यशस्वी बनाते हैं। मानवीय मूल्यों की प्रबल पक्षधर यश जी के गीत समन्वय और संतुलन के प्रबल पक्षधर हैं।

-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

Author

यशपाल सिंह 'यश'

Format

Paperback

ISBN

978-93-47306-90-7

Language

Hindi

Pages

104

Genre

गीत

Publisher

Shwetwarna Prakashan

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