हर वर्ष आने वाली बाढ़ केवल खेत-खलिहानों को ही नहीं डुबोती, वह स्मृतियों, संबंधों, सपनों और मनुष्य की जिजीविषा की भी परीक्षा लेती है। इन्हीं अनुभवों को अत्यंत संवेदनशील, कलात्मक और नवीन शिल्प में प्रस्तुत करता है ‘बाढ़’ लघुकथा-संग्रह। इस लघुकथा-संग्रह में कथाकार रंजन ने बाढ़ को प्राकृतिक आपदा के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के जटिल संबंध, लोक-संस्कृति, विस्थापन, स्मृति, प्रेम, विश्वास और पुनर्निर्माण के बहुआयामी प्रतीक के रूप में देखा है।
संग्रह की तीस लघुकथाएँ ‘आहट’, ‘संघर्ष’ और ‘वापसी’; इन तीन खंडों में विभाजित हैं। प्रत्येक कथा अपने सूक्ष्म कथानक, काव्यात्मक भाषा, वातावरण-निर्माण और गहन मानवीय संवेदना के कारण पाठक के भीतर देर तक प्रतिध्वनित होती रहती है। यहाँ कथाएँ किसी चमत्कारपूर्ण अंत या तीखे व्यंग्य पर नहीं टिकतीं, बल्कि धीरे-धीरे पाठक के अंतर्मन में उतरकर जीवन के उन सत्यों से साक्षात्कार कराती हैं, जिन्हें सामान्यतः अनदेखा कर दिया जाता है। इन रचनाओं में लोकजीवन, अंगिका अंचल की आत्मा, प्रकृति की जीवंत उपस्थिति तथा मनुष्य की करुणा एक-दूसरे में इस प्रकार घुल-मिल जाती है कि यथार्थ और संवेदना का विलक्षण कथा-लोक निर्मित हो उठता है।
‘बाढ़’ समकालीन हिन्दी लघुकथा को एक नया सौंदर्यबोध, नई कथाभाषा और नया शिल्प प्रदान करने वाला महत्त्वपूर्ण संग्रह है। यह पुस्तक केवल बाढ़ की नहीं, बल्कि उन लोगों की कथा है जो हर वर्ष टूटते हैं, फिर भी जीवन के प्रति अपना विश्वास नहीं खोते। इसलिए यह संग्रह अंततः मनुष्य की अटूट आस्था, उसकी जिजीविषा और पुनः उठ खड़े होने की अनश्वर शक्ति का मार्मिक उत्सव बन जाता है।
इस संग्रह की एक और विशेषता इसकी वाक्य संरचना है। यह गद्य होकर भी काव्यत्मक रूप में लिखी गयी है। इसे पढ़ते हुए पाठक कथा के एक-एक सूत्र से उसी प्रकार गुज़रता है जैसे कोई सीढ़ी उसकी बौद्धिक चेतना से हृदय तक उतर रही हो।
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| Author | रंजन |
|---|---|
| Format | Hardcover |
| ISBN | 978-81-69342-13-1 |
| Language | Hindi |
| Pages | 132 |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |
| Genre | लघुकथा |



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