पुस्तक से समाज को क्या मिलेगा, इस पर अपनी बात रखता हूँ। मैं सदैव प्रयास करता हूँ कि पुस्तक सामग्री और उसकी गुणवत्ता के विषय में लोगों को बताया जाए जिससे और लोग पुस्तक को पढ़ने हेतु लालायित हो उठें। आज के भीड़ भरे साहित्यिक परिदृश्य में समीक्षाएँ किसी पुस्तक को लोगों तक पहुँचाने में मदद करती हैं। समीक्षाएँ मायने रखती हैं और साहित्य के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं। एक बात और… मैं अपनी इन टिप्पणियों से एक तथ्य से और अवगत हुआ हूँ… ‘ईमानदार समीक्षाएँ साहित्यिक प्रेम पैदा करती हैं।’
फ़ेसबुक पर मित्रों की राय बनी कि इन टिप्पणियों को पुस्तकबद्ध किया जाए। मेरे भी मन में एक लोभ जगा कि ऐसा हो जाने से जो इधर-उधर बिखरा पड़ा है, वह इकट्ठा हो जाएगा। इस संग्रह की टिप्पणियों को मित्रों ने भले समीक्षा कहा हो लेकिन यह किसी भी पुस्तक पर मन में आई त्वरित टिप्पणी भर है, बस इसके सिवा और कुछ नहीं। मैं उसे जस का तस आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। संभव है एक बार पुनः ये टिप्पणियाँ उन पुस्तकों तक आपको पहुँचाने में सहायक सिद्ध होंगी।
-राजेश ओझा



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