बिरसा मुंडा महाकाव्य / मुकेश कुमार सिंह

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बिरसा मुंडा महाकाव्य, एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान बिरसा मुंडा जी के जन्म से लेकर उनके भारत माता की स्वतंत्रता और जनजातीय समाज के गौरव के हित में महाप्रयाण तक के संपूर्ण कालखंड को तांटक छंद विधान में लिखा गया है।
महाकाव्य तो इसके पूर्व में भी कई एक लिखे गये, परन्तु वे इस छंद में नहीं लिखे गये। तांटक छंद में लिखने पर बाध्यता तुकांत की आती है जैसा कि बिरसा मुंडा महाकाव्य में कवि मुकेश ने बिरसा मुंडा को तुकांत का आधार मानकर पूरा महाकाव्य लिखा है। इसलिए इतने दुरूह तुकांत (क़ाफिया) के साथ निर्वहन कवि के अद्वितीय साहित्य कौशल का परिचायक है। 1, 3, 5 तथा 7 वें चरण में मात्रिक भार 16, जबकि 2, 4, 6 तथा 8 वें चरण में मात्रिक भार 14 होना तथा अंतिम तीन अक्षर दीर्घ होना नितांत आवश्यक है। यही व्याकरण इस छंद तथा बिरसा मुंडा महाकाव्य को अन्य महाकाव्यों से अलग करता है। कवि मुकेश ने इस महाकाव्य के सृजन करते समय भगवान श्री बिरसा मुंडा जी की अनन्य भक्ति की है। कवि उनके चरित्र में डूब गया है। डूबने के पश्चात जो मोती निकले हैं, वो इस महाकाव्य को अमर करने की पूर्ण क्षमता रखने वाले हैं। पिता पूज्य सुगना जी और माता श्रेष्ठ करमी जी ने भारत को न सिर्फ़ एक अनोखा वीर क्रांतिकारी दिया बल्कि एक महात्मा, विचारक और भगवान भी दिया। उनका त्याग और तपस्या उनको अनेक ऐतिहासिक चरित्रों की भांति पूज्यनीय बनाती हैं। भगवान बिरसा मुंडा, साहित्य और कविता से प्रेम करने वाले हर व्यक्ति के पास ये ग्रन्थ अवश्य होना चाहिए, क्योंकि देशभक्ति, वीरता, कुरीतियों से विलग होने की सीख, समाज सुधार की राह और स्वधर्म गर्व की गूढ़ शिक्षा इस महाकाव्य में निहित है।

– डॉ. सुरेश अवस्थी

Author

मुकेश कुमार सिंह

Format

Paperback

ISBN

978-81-99171-54-1

Language

Hindi

Pages

252

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

कविता

6 reviews for बिरसा मुंडा महाकाव्य / मुकेश कुमार सिंह

  1. Rated 5 out of 5

    अमित पाल (शोधार्थी एवं बिरसायत) (verified owner)

    नित्यप्रति स्नानादि से निवृत्त होकर “बिरसा मुंडा महाकाव्य” का पाठ करके मुझे आत्मिक शांति का अनुभव हो रहा है। इसके प्रतिदिन के 10-15 पाठ करने से मेरे पूरे दिन का आत्मविश्वास उच्च रहता है एवं जीवन की कठिनाइयां तुच्छ प्रतीत होती हैं।

  2. Rated 5 out of 5

    अमित पाल (verified owner)

    नित्य प्रति स्नानादि से निवृत होकर “बिरसा मुंडा महाकाव्य” का पथ करके मुझे आत्मिक शांति का अनुभव हो रहा है, इसके प्रतिदिन के १०-१५ पृष्ठ का पाठ करने से ही मेरा पूरा दिन आत्मविश्वास का स्तर उच्च बना रहता है, उसके पाठ से मुझे अपने जीवन की अनेक कठिनाइयों तुच्छ प्रतीत होती है
    अमित पाल
    शोधार्थी एवं बिरसायत

  3. Rated 5 out of 5

    Kaushal Kishor

    This is very good book of Hindi literature. Book is written in Chand vidha which is very sweet part of it. This Mahakavya covers the complete life sketch of Bhagwavn Birsa Munda.

  4. Rated 5 out of 5

    Sanjeev Rajput

    एक ऐसा समय जब उत्कृष्ट साहित्य तो दूर बल्कि साहित्य के नाम पर चुटकलों और फूहड़ता को सम्मानित किया जा रहा हो, ऐसे समय में विशुद्ध काव्य लिखना ही अत्यंत दुरूह जान पड़ता है , ऐसे समय में महाकाव्य लिखना ईश्वरीय कृपा एवं प्रेरणा के बिना असंभव है , ये कृपा शायद स्वयं भगवन बिरसा मुंडा जी ने लेखक डा मुकेश कुमार सिंह पर की है, उनके द्वारा रचित “बिरसा मुंडा महाकाव्य इक्कीसवीं सदी का प्रथम महाकाव्य है , इस महाकाव्य में डा मुकेश कुमार सिंह जी ने उनीसवीं सदी को पुनः जीवित करके भगवन बिसरा मुंडा जी के व्यक्तित्व, कृतित्व, एवं चरित्र को जनमानस के समक्ष बड़ी सहजता के साथ प्रस्तुत किया है , साहित्य जगत उनके इस भगीरथ प्रयास का सदैव ऋणी रहेगा
    डा संजीव कुमार राजपूत
    वरिष्ठ साहित्यकार
    औरैया, उत्तर प्रदेश

  5. Rated 5 out of 5

    Anil Kumar Awasthi

    हरिवंशराय बच्चन ने एक विषय पर ‘मधुशाला’ लिखकर ख्याति प्राप्त की और हिन्दी साहित्य में अपना स्थान स्थापित किया। उन्होंने पूरी पुस्तक में विषय से विषयांतर हुए बिना लेखन किया, परन्तु वे व्याकरण के अनुसार एकवचन तक ही सीमित रहे।
    परंतु मुकेश सिंह ने आगे बढ़ते हुए चार अलग-अलग विषयों पर चार पुस्तकें लिखीं। आपने हर पुस्तक में शुरू से अंत तक एक ही विषय का निर्वाह किया है। छंद-विधान में बंधे रहकर, बिना विषय बदले चार पुस्तकें लिखकर आप बहुवचन की श्रेणी में शामिल हुए और एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।
    मेरी जानकारी के अनुसार हिन्दी साहित्य में अब तक किसी अन्य साहित्यकार ने ऐसे लेखन का प्रयास नहीं किया है। अतः आप छंद विधा में लिखी गई इन पुस्तकों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर हिन्दी साहित्य जगत में मील का पत्थर बन गए हैं।
    अनिल अवस्थी
    (साहित्य सेवी, संस्थापक- बाल कल्याण संवर्धन संस्थान)

  6. Rated 5 out of 5

    Shiv Govind Prasad

    भगवान बिरसा मुंडा जी के प्रति मेरी आस्था इस महाकाव्य को पढ़ने के पश्चात और भी गाढ़ी हो गयी है। जहां तक मैं समझता हूं कि लेखक डॉ0 मुकेश कुमार सिंह जी ने इक्कीसवीं सदी का पहला महाकाव्य लिखकर हिंदी साहित्य का संवर्धन तो किया ही है बल्कि “बिरसा मुंडा महाकाव्य” के माध्यम से भारत के स्वाधीनता संग्राम के अमर सपूत की अमर गाथा को तांटक छंद में लिखकर जन-जन तक पहुंचाया है। मेरी दृष्टि में यह महाकाव्य पूज्यनीय है।

    डॉ0 शिव गोविन्द प्रसाद,
    उप-कुलसचिव, यूपी टीटीआई कानपुर।

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