शिव कुमार पराग हिंदी एवं भोजपुरी ग़ज़ल की जनपक्षीय परम्परा के सुपरिचित ग़ज़लकार हैं। बेहद मृदुभाषी और शालीन प्रकृति के ‘पराग’ के व्यवहार से आप कतई अंदाज़ा नहीं लगा पाएंगे कि यह मुस्कराता व्यक्ति अपनी अग्निधर्मा काव्याभिव्यक्ति में कितने ज्वालामुखी अपने अंदर समेटे हुए है।
कवि के स्वभाव में प्रतिरोध है, उसे झुकना स्वीकार नहीं। तरह-तरह के प्रलोभन भी उसे विचलित नहीं कर पाते हैं। पराग की ग़ज़लों में प्रतिरोध की यह चेतना उनकी सामाजिक, राजनीतिक चेतना का ही उत्कर्ष है। कह सकते हैं कि पराग मूलतः सामाजिक चिंता और प्रतिरोध के कवि हैं।
उनकी ग़ज़लें साम्प्रदायिक विद्वेष के ख़िलाफ़ खड़ी रहकर लोकतंत्र, समन्वय, समरसता और एकता के प्रति अटूट आस्था का आह्वान करती हैं। उनकी ग़ज़लें एक तरफ अपने समय की गड़बड़ियों की शिनाख़्त करती हैं तो दूसरी ओर समय के सवालों से टकराती हैं। ऐसा करते हुए वे हमारे समय के प्रमुख जनधर्मी ग़ज़लकार दुष्यंत, अदम, शलभ, कृषक आदि की समृद्ध परम्परा से जुड़ते हैं।
– हरेराम समीप



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