‘अगर मैं बोलूँगा’ महज़ एक कहानी-संग्रह का शीर्षक नहीं, बल्कि आज के दौर में सत्ता और समाज से टकराते आम आदमी के साहस और उसकी बेचैनी की मुखर अभिव्यक्ति है। रचना जी की ये कहानियाँ एक ज़रूरी दस्तावेज़ हैं, जो उन अनसुनी आवाज़ों को मंच देती हैं जिन्हें अक्सर हाशिये पर धकेल दिया जाता है। इस संग्रह की कहानियाँ पाठक को उन किरदारों की दुनिया में ले जाती हैं जो अपने-अपने तरीक़े से एक दमनकारी व्यवस्था का सामना कर रहे हैं। लेखिका का मानना है कि ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है और ये कहानियाँ उसी प्रक्रिया का परिणाम हैं। यह संग्रह हर पाठक के मन में यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या हम अपने हिस्से का सच बोल रहे हैं? यह हमें याद दिलाता है कि ख़ामोशी भी एक तरह की सहभागिता है और ‘कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा’ की उम्मीद ही लोकतंत्र की आत्मा है।
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| Author | रचना |
|---|---|
| Format | Paperback |
| ISBN | 978-93-49947-83-2 |
| Language | Hindi |
| Pages | 116 |
| Genre | कहानी |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |
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