अपने संक्षिप्त से ग़ज़ल अध्ययन के दौरान मेरा ये अनुभव रहा है कि उर्दू ग़ज़ल पर जब भी बात होगी तो पाकिस्तान की ग़ज़लगोई को शामिल करना अनिवार्य होगा। अकेले हिन्दुस्तान की उर्दू ग़ज़ल पर बात करना संभव नहीं होगा। दोनों मुल्कों की ग़ज़लें आपस में इतनी शिद्दत से गुँथी हुई है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
दोनों देशों की उर्दू कहानी, उर्दू उपन्यास पर आप अलग तबसरा कर सकते हैं। ऐसा होता भी रहा है। लेकिन ग़ज़ल की बात, उपमहाद्वीप की बात होगी। आप उर्दू की जदीद ग़ज़ल पर बात करते हुए, नासिर, काज़मी, इब्ने इंशा, अहमद फ़राज़, जौन एलिया, ज़फ़र इक़बाल, अहमद मुश्ताक़, रशीद कैसरानी, परवीन शाकिर, अहमद सलमान, जुल्फ़िकार आदिल इत्यादि शायरों को कैसे छोड़ सकते हैं।
उर्दू ग़ज़ल का सुन्दर पक्ष है कि हालात बेशक कशीदा रहे दोनों के बीच, लेकिन, ग़ज़ल रूपी तिनकों का पुल कभी नहीं टूट पाया।
अपने लेखन के दौरान, मैंने कई सारे ग़ज़ल विशेषांक तैयार किए हैं।
यह पुस्तक-उर्दू ग़ज़ल यात्रा, किसी रचनात्मक और ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह है। यह ग़ज़ल का सबसे ताक़तवर पक्ष है कि ग़ज़ल हर दौर में लिखी जाती रही। हर दौर के शायर ने अपने समकाल को बड़ी एकाग्रता से व्यक्त किया। यह निरंतरता आप इस पुस्तक में महसूस करेंगे। यहाँ मैंने उत्कृष्ट ग़ज़लों का चयन किया है, इसे भी आप महसूस करेंगे।
-ज्ञानप्रकाश विवेक
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