अभिषेक की ज़्यादातर ग़ज़लों में समकालीन विषम परिवेश और आज के दौर की विडम्बनाओं, विषमताओं, विसंगतियों का चित्रण है। मुझे अभिषेक की ग़ज़लें वर्तमान समय की कठिन परिस्थितियों की समीक्षा जैसी लगती हैं। जो कुछ है वह कठिन वर्तमान का बयान है। ये ग़ज़लें देश का भावुकतापूर्ण जयगान नहीं, देश में छाए संकट का हाहाकार हैं।
एक-एक शेर में समकालीन संकटों, त्रासद भविष्य की आहटों, सरकार के राजनीतिक सरोकारों का पर्दाफाश है। ग़ज़लों में वैविध्य अधिक मात्रा में भले ही न हो, पूरी प्रासंगिकता और तीक्ष्ण यथार्थ-बोध है।
-बाल स्वरूप राही



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