शीतांशु अरुण नाम अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यदि अंगक्षेत्र की अंगिका भाषा साहित्य संसार पर छा रही है तो अंगक्षेत्र की सुप्रसिद्ध प्रेमकथा ‘महुआ घटवारिन’ को फिल्मी पर्दे पर उतारने वाले शीतांशु अरुण जी भी अपने थियेटर को नया आयाम देते हुए, अंगक्षेत्र सहित पूरे देश के रजत पट की दुनिया में एक कीर्तिस्तम्भ बनकर खड़े हो गए हैं। वे थियेटर के आदमी हैं और थिएटर के हर पहलू पर समान अधिकार रखते हैं। अभिनय और निर्देशन ही नहीं, कथा और पटकथा लेखन में भी उतने ही निपुण हैं। कथा गढ़ना तो जैसे उनके लिए चुटकी बजाने जैसा है; और जो कथा गढ़ते हैं वो कल्पना के लिबास से निकल कर सत्य के रूप में प्रत्यक्ष हो जाता है। उनके इस संग्रह के आत्मग्लानि सहित सात कहानियाँ तान्या, जब जगे तब ही सवेरा, विष-कन्या, वंश, क़िस्मत और रधिया संग्रहित हैं। सभी कहानियाँ संवेदना को छूती हैं और उनका पाठ पूर्ण सार्थक लगता है।भाषा आडंबर विहीन और सुग्राह्य है, जो पाठकों को जोड़़ने और प्रभावित करने में समर्थ हैं।
-अरुण कुमार पासवान
पूर्व सहायक निदेशक, कार्यक्रम, आकाशवाणी
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