अवनीश त्रिपाठी की कविताएँ, ‘तारीखें खाता हुआ आदमी’ शीर्षक के अंतर्गत एक कविता संग्रह के रूप में मेरे सामने हैं। जब से इन कविताओं को पढ़ना शुरू किया है, इनके इंद्रजाल में अटक कर रह गया हूँ। कविताओं का विषय वैविध्य, अनूठी बिंब सृष्टि और प्रांजल भाषिक प्रवाह अद्भुत है। किसी भी कविता में प्रवेश करता हूँ तो उसके भीतर का स्थापत्य और अनुभूति-संसार जाना पहचाना-सा होने पर भी चमत्कृत करता है। शब्दों के सलीब पर लटकी भावनाएँ, कविता से निकल कर मन-मस्तिष्क पर आधिपत्य जमा लेती हैं। रूमी ने संभवतः ऐसी कविताओं के बारे में ही कहा था – कविता ख़तरनाक हो सकती है, विशेषकर अगर वह मनोहारी कविता हो। इसका कारण है कि वह आपको उस अनुभव से गुज़रे बिना ही उस अनुभव की प्राप्ति का भ्रम दे देती है। (Poetry can be dangerous, especially beautiful poetry, because it gives the illusion of having had the experience without actually going through it. ― Rumi.) अवनीश की कविताएँ ऐसी ही हैं।
– राजेश्वर वशिष्ठ



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