डॉ. उषा अरोड़ा ने जीवन के अनुभवों से जो कुछ पाया उसे केवल अपने और अपनों के लिए ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे पूरे समाज की थाती अर्थात धरोहर बना दिया है। पुस्तक के इन लेख और संस्मरणों में भारतीय संस्कृति, मान्यताएँ और उच्च परंपराएँ अपने पूरे उद्वेग के साथ उपस्थित हैं। ये रचनाएँ विभिन्न धरातल पर जीवन के अनेकानेक चरित्रों की पाठशाला हैं। ये रचनाएँ एक माँ को सिखाती हैं कि उसे परिवार में अपने बच्चों के साथ किस तरह से व्यवहार करना है, उन्हें कैसे संस्कारित करना है। पत्नी को सिखाती हैं कि पति के प्रति अपनी भूमिका का निर्वहन कैसे करे। साथ ही परिवार को कैसे सुघड़, सुंदर परिवार बनाए रखना है। राष्ट्र के प्रति समर्पण और गुरुतर दायित्व के निर्वहन को भी प्ररित करती हैं ये रचनाएँ। इसी के साथ शिक्षक और शिक्षार्थियों के संबंधों का महीन लेखा-जोखा भी इन रचनाओं में है। लेखिका द्वारा वैयक्तिक रूप से रिश्तों का जी भर के रसपान करने के कारण इन लेखों में जहाँ रिश्तों की मिठास बनाए रखने के सूत्र हैं, तो वहीं गंभीरता से समाज के प्रति दायित्वों का बोध भी दृष्टिगोचर होता है।
ये लेख पिछली सदी के सातवें आठवें दशक से प्रारंभ होकर अद्यतन विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। दैनिक अमर उजाला के रूपायन परिशिष्ट में प्रकाशित छोटे-छोटे आलेखों में तो आपने जैसे गागर में सागर ही भर दिया है।
– अशोक ‘अंजुम’



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