आलोक की शायरी भले ही दुष्यंत आलोक में, ट्रेडिशन में जन्मी हो लेकिन उनकी अपनी ज़मीन है और बीते सदी के अँधेरे आज उजाले के मानिंद हैं। इस सदी के आभासीय उजाले में जो अँधेरे हैं, शायर वहाँ से अपने वक़्त को देख रहा है। उसे होशमंदी में देखने की सलाहियत शायरी में आद्यंत दिखाई देती हैं। हर शायर परंपरा में ही आधुनिक होता है। उसे अपने समय से संवादी होना होता है भले ही वह पुराने से ज़्यादा जटिल समाज हो। वह पहले अपने दौर की शिनाख़्त करता है मसलन-
‘कभी शिखर तो कभी घाटियाँ थीं राहगुज़र,
मेरे नसीब में समतल कोई ज़मीन नहीं।’
यह आलोक की काव्य ज़मीन है। जहाँ इश्क़ का भी काला बाज़ार है। बद से बदतर किसानों के हालात हैं। तंगदस्ती है, मुफ़्लिसी है और शायर की निगाह के सामने बदलता समाज है जिसके रोएँ-रेशे में वह उतरता है।
-लीलाधर मंडलोई
(लब्धप्रतिष्ठ कवि एवं पूर्व डायरेक्टर जनरल AIR/DD)



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