‘समकालीन हिन्दी ग़ज़ल : एक विमर्श’ ग़ज़ल आलोचना पर डॉ. रोहिताश्व अस्थाना दूसरी गवेषणात्मक पुस्तक है। इसमें सन 2016 से 2022 तक सात वर्षों में हुए हिन्दी ग़ज़ल की उपलब्धियों और उसके विकास के नए प्रतिमानों की जानकारियों को दर्ज किया गया है साथ ही कुछ महत्वपूर्ण संग्रहों के बहाने आ रहे बदलाव को चिह्नित किया गया है। ‘दो शब्द’ शीर्षक भूमिका में डॉक्टर अस्थाना ने इस पुस्तक की अंतर्वस्तु और इसके उद्देश्यों को स्पष्ट किया है।
वास्तव में उन्होंने हिंदी ग़ज़ल से अपने लगाव को बरकरार रखते हुए अनेक महत्वपूर्ण वार्षिकी ‘भाषा’ के लिए पूरे साल की हिन्दी ग़ज़ल के विकास की गतिविधियों की सूचना आलेख के रूप में प्रस्तुत करते रहे। समय और यथार्थ में आये बदलाव और ग़ज़ल के तेवर के बदलाव की वे साल-दर-साल पड़ताल करते रहे। इसलिए यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में शोधार्थियों के लिए है। इसमें हिन्दी ग़ज़ल पर अनेक पत्रिकाओं के ग़ज़ल विशेषांक, प्रकाशित ग़ज़ल संग्रहों, संकलनों आदि की जानकारी है तथा आलोचनात्मक साहित्य की विविध सूचनाएँ भी दर्ज हैं। सचमुच यह एक विस्मयकारी कार्य वे मौन साधक की तरह वर्षों तक करते रहे।
-हरेराम समीप



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