यह गरिमा सक्सेना का नया ग़ज़ल संग्रह है। मैं जब किसी युवा ग़ज़ल-लेखक की ग़ज़ल-पुस्तक पढ़ना शुरू करता हूँ तो मेरे मन में यह उम्मीद भी जागृत होती है कि यहाँ नयी रचनाशीलता होगी। नये समय की छवियाँ होंगी। नये बनते समाज की विडम्बनाएँ और उनकी अभिव्यक्ति के लिए ईजाद की गयी ग़ज़ल-शैली होगी और वो दृष्टि भी, जिसमें प्रतिवाद की तीक्ष्णता होगी और साथ ही साथ कारुणिक और संवेदनशील अनुभूति भी। वो इन ग़ज़लों में भी है। खरापन, बेबाकी, स्पष्टबयानी के अतिरिक्त चुनौतीपूर्ण लहजा भी है।
उनकी यह नयी ग़ज़ल- पुस्तक जिसमें इकहत्तर ग़ज़लें हैं। रोज़ बदलती दुनिया के, रोज़ बदलते मिज़ाज को, ग़ज़ल के शेरों में, एकाग्रता और निष्ठा से व्यक्त किया गया है। नयी दृष्टि उनकी अनुभूति में है और ग़ज़ल-कथन का तनाव उनकी शेरियत में है। उन्होंने ग़ज़ल शब्द, ग़ज़ल भाषा और ग़ज़ल कथन को रचनात्मक परिसर प्रदान किया है।
-ज्ञान प्रकाश विवेक



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