अनामिका सिंह की ग़ज़लें जनसरोकारों की सीधी-सीधी हिमायती हैं। समाज के अंतिम पायदान का आदमी, वंचित वर्ग इनकी ग़ज़लों के केंद्र में हैं और उन्हीं के पक्ष में खड़ी इनकी ग़ज़लें बड़ी बेबाकी और मुखरता के साथ इनकी हिमायत करती हैं। इस वंचित वर्ग में सदियों से वंचना का शिकार रही आधी आबादी भी पूरी धमक के साथ मौजूद है तो मानव की विनाशकारी हरकतों से त्रस्त प्रकृति भी।
अपने समय की हर एक असंगति पर अनामिका सिंह बहुत बेबाकी के साथ अपनी बात रखती हैं। चाहे सत्ता अथवा व्यवस्था की ख़ामियाँ हों या समाज के साधारण आदमी की लापरवाही भरी हरकतें, ये अपने शेरों के माध्यम से उन सबकी ख़बर लेती हैं और उन्हें अहसास करवाती हैं कि कहाँ चूक हो रही है और कहाँ सुधार की ज़रूरत है।
| Author | अनामिका सिंह |
|---|---|
| ISBN | 978-93-47306-27-3 |
| Format | Hardcover |
| Language | Hindi |
| Pages | 122 |
| Genre | ग़ज़ल |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |



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