हिंदी साहित्य का सत्तर प्रतिशत काव्य शृंगार पर आधारित है। दोहों में भी शृंगार की प्रचूरता प्रारम्भिक काल से ही देखने को मिलती है। इस परम्परा को महत्वपूर्ण आयाम तक पहुँचाने का कार्य ‘बिहारी’ ने किया। बाद के रचनाकारों ने भी विभिन्न भावों के शृंगारिक दोहे कहे हैं। एक तरफ जहाँ शृंगार के सफल वर्णन के नाम पर काम भाव के विकृत रूप को प्रस्तुत किया जा रहा है वहीं राजेश जैन ‘राही’ जैसे रचनाकार आज भी रसज्ञ और मर्मस्पर्शी दिखायी देते हैं।
अपने दोहों से चित्र वीथिकाएँ निर्मित करने वाले राजेश जी विभाव, अनुभाव, संचारी भावों की स्थूल और सूक्ष्म दशाओं के सजीव एवं स्वाभाविक चित्र प्रस्तुत करते हैं। नयी कहन, भंगिमा के साथ नवीन उपमानों का सार्थक प्रयोग, इनके दोहों को नवीनता प्रदान करता है। छवि चित्रण, भाव चित्रण के साथ-साथ संवाद शैली में भी उन्हें महारथ हासिल है। कहीं-कहीं विप्रलम्भ का भाव दोहों को और सुदृढ़ता प्रदान करता है।
जब कोई हृदय, प्रेम में होता है, उसे हर जगह, हर दिशा में, कण-कण में, प्रियतम दिखायी देता है। यही कारण है कि राजेश जी को आम ज़िंदगी की हर वस्तु में, ऋतुओं में, बाग़ में, बहार में, चाँद-तारों में, यहाँ तक कि बजट, नोट, अर्थशास्त्र में भी प्रियतम की छवि नज़र आती है।
-गरिमा सक्सेना



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