प्रस्तुत पुस्तक, ‘प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बुन्देलखण्ड’, इसी गौरवशाली इतिहास का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। लेखक द्वय देवेन्द्र कुमार सिंह और डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने गहन शोध के माध्यम से यह स्थापित किया है कि बुन्देलखण्ड में 1857 का संघर्ष केवल एक ‘सैनिक विद्रोह’ नहीं था, बल्कि यह एक राष्ट्रीय विद्रोह था जिसमें राजाओं के साथ-साथ आम जनता, किसानों और मजदूरों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
यह पुस्तक हिंदी साहित्य में उपलब्ध अन्य ऐतिहासिक कृतियों से इस मायने में अलग है कि इसमें 1857 से लेकर 1862 तक की घटनाओं का तिथिवार विवरण प्रस्तुत किया गया है। यह केवल झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई या तात्या टोपे जैसे सुप्रसिद्ध महानायकों की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन विस्मृत नायकों को भी प्रकाश में लाती है जिन्हें इतिहास ने वह स्थान नहीं दिया जिसके वे अधिकारी थे। बानपुर के राजा मर्दन सिंह, शाहगढ़ के राजा बखतबली, और जन-नायक देशपत बुन्देला, बरजोर सिंह, छत्रसिंह व रणमत सिंह जैसे अनगिनत वीरों के संघर्ष की कहानी यहाँ विस्तार से दर्ज है।
लेखकों ने इस कृति को तथ्यपरक बनाने के लिए क्षेत्रीय अभिलेखागार (इलाहाबाद), राष्ट्रीय अभिलेखागार (दिल्ली) और राज्य अभिलेखागार (लखनऊ) के दुर्लभ दस्तावेजों का उपयोग किया है। विशेष रूप से, पुस्तक में शामिल ‘म्यूटिनी टेलीग्राम्स’ और डेथ वारंट्स की मूल प्रतियाँ पाठकों को उस दौर की प्रशासनिक खलबली और क्रान्ति की तीव्रता का साक्षात अनुभव कराती हैं।
यह ग्रन्थ न केवल झाँसी, बल्कि बाँदा, हमीरपुर, जालौन, सागर, दमोह, ललितपुर, और जबलपुर जैसे सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड क्षेत्र के संघर्ष को एक सूत्र में पिरोता है। शोधार्थियों, इतिहास-प्रेमियों और अपनी मिट्टी के अतीत पर गर्व करने वाले प्रत्येक पाठक के लिए यह पुस्तक एक अमूल्य निधि है, जो अतीत के झरोखे से 1857 के उस महासमर को जीवंत कर देती है।



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