कहानी का स्वरूप और उद्देश्य कहानी केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और अंतर्मन के द्वंद्वों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। इसका मूल उद्देश्य समाज की उन अनकही सच्चाइयों और संघर्षों को सामने लाना है, जिन्हें अक्सर औपचारिकताओं के कारण अनदेखा कर दिया जाता है।
विकलांगता-विमर्श की नई दृष्टि आज के साहित्य में विकलांगता को केवल दया या सहानुभूति के सीमित दायरे से बाहर निकालकर एक सशक्त विमर्श के रूप में देखा जा रहा है। यह विमर्श स्थापित करता है कि विकलांगता व्यक्ति की कमी नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना की विफलता है जो अनुकूल परिवेश देने में असमर्थ रही। प्रत्येक व्यक्ति, शारीरिक क्षमता से परे, अपनी गरिमा और आत्मसम्मान का हकदार है।
गीता शर्मा का साहित्यिक योगदान गीता शर्मा ने विकलांगता-विमर्श को साहित्य के केंद्र में लाने का सराहनीय कार्य किया है। उनके संकलन— ‘कुकनसु’, ‘पुनर्नवा’ और अब ‘नीलकुरिंजी’—इसी प्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। इन कहानियों में किसी कृत्रिम चमत्कार के बजाय जीवन के यथार्थ को दर्शाया गया है। उनका यह संपादन कार्य हाशिए पर खड़े समाज के मौन को आवाज़ देकर पाठकों में नई सामाजिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता पैदा करता है।



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