हर रचनाकार अपने युग का व्याख्याता होता है और जब चिंतन की धूनी में प्रेम और सत्य की आँच पैदा करने की उसमें सामर्थ्य होती है तो वह अपने युग का प्रणेता होता है। रचना अपने वर्तमान को रेखांकित ही नहीं करती बल्कि वह प्रश्नों का समाधान भी तलाशती है। मंजू ने गम्भीर के नवगीतों में युग चेतना की जिस अंतर्शक्ति को खोजा है वह युगीन सन्दर्भो-बाजारवाद, वैश्वीकरण, पर्यावरण तथा मानवीय संवेदना के प्रतिष्ठापन को भी उपयोगी सिद्ध करती है। इस चिंतन के क्रम में युग की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण जो भी गम्भीर के नवगीतों में समाविष्ट है उसे पर्त दर पर्त खोलने की कोशिश की गई है। कहा गया है कि ‘जहाँ न जाय रवि वहाँ जाय कवि’ तक पहुँच पाना समीक्षक के लिए सम्भव नहीं है।
मंजू की दृष्टि में गम्भीर के नवगीतों की भाषा-सामर्थ्य अद्भुत है। उनकी भाषिक संरचना में खड़ी बोली के साथ तत्भव एवं देशज शब्दों के प्रयोग हैं, आंचलिक शब्द-योजना है, तत्सम शब्दावली है, अंग्रेजी एवं तकनीकी शब्दों के प्रयोग हैं और नये प्रतीकों, बिम्बों और उपमानों के प्रयोग हैं। स्पष्ट है कि गम्भीर के विराट व्यक्तित्व से फूटे इन नवगीतों को एक लघु ग्रंथ में समेटना सम्भव
नहीं है। उन्होंने जिन जीवन-मूल्यों को इन नवगीतों के माध्यम से संप्रेषित किया उसका वृत्त बड़ा ही व्यापक है। आशा है कि इस कृति को सुधी पाठक और शोधार्थी गम्भीरता से पढ़ेंगे, यह हिन्दी पटल पर अवश्य लोकप्रिय होगा।
डॉ. ओम प्रकाश सिंह
साकेत नगर, लालगंज
रायबरेली, उ.प्र.



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