हिंदी ग़ज़ल की यात्रा में दिन-दिन नए क़दम जुड़ते जाते हैं। इनमें कुछ क़दम ऐसे भी हैं, जो इसकी ज़मीन पर अपने निशान छोड़ जाने का सामर्थ्य रखते हैं। इनमें एक नाम सत्यम भारती का भी है। यह सामर्थ्यवान युवा ग़ज़लकार, अपने लिखे से उम्मीद बंधाता है। सत्यम के पास शिल्प की ज़रूरी समझ है, भाषा का पैनापन है, विषय-वस्तु का विस्तार है, एक मज़बूत दृष्टि है, जिनके दम पर वे हिंदी ग़ज़ल के आकाश में कुछ अपनी तरह के रंग भरने का विश्वास पैदा करते हैं।
इनकी ग़ज़लों में शब्दावली और प्रतीकों पर गौर करने पर आभास होता है कि इनके पास हिंदी ग़ज़ल के स्वरूप की समझ है और उसे ज़रूरी दिशा देने का माद्दा भी। इनके पास दुनिया और उसके चलन की पहचान है तथा इस चलन के अवलोकन से निर्मित होता दर्शन भी। इनकी ग़ज़लों में प्रेम का अहसास भी है और जीवन के अनुभव भी। सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि इनके पास एक बेहतर परिदृश्य, एक बेहतर संसार रचने का हौसला भी है। एक चाह है, जिसके दम पर वे नया गढ़ना चाहते हैं, पुराने व जर्जर को ‘कुछ नए’ से परिवर्तित करना चाहते हैं।



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