हिन्दी ग़ज़ल का समकाल और बिहार / डॉ. अविनाश भारती

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हिन्दी ग़ज़ल, जो कभी प्रेम और श्रृंगार की महफ़िल तक सीमित थी, वह अब जन-जीवन के यथार्थ, संघर्ष और राजनीति की विसंगतियों की मुखर आवाज़ बन चुकी है। फ़ारसी और उर्दू से होते हुए हिन्दी में आई इस विधा ने दुष्यंत कुमार की परम्परा में अपनी आत्मा को पूरी तरह से स्वदेशी बनाकर प्रतिरोध और परिवर्तन की भाषा का नया अर्थ पाया है। ‘हिन्दी ग़ज़ल का समकाल और बिहार’ इसी गौरवशाली यात्रा का एक पुख़्ता प्रमाण है, जो साहित्य की उर्वर भूमि बिहार में पनपी समकालीन हिन्दी ग़ज़ल की जड़ों, संवेदनाओं और विशिष्ट पहचान को रेखांकित करता है।

डॉ. अविनाश भारती का यह अकादमिक अध्ययन बिहार के उन ग़ज़लकारों के प्रति समर्पित है, जिन्होंने अपनी कलम से इस धरती को साहित्यिक गौरव से आलोकित किया है। यह पुस्तक आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के संग्रह ‘सुने कौन नग्मा’ (1994) से शुरू हुई सशक्त साहित्यिक दस्तक को केंद्र में रखती है, जिन्हें बिहार में हिन्दी ग़ज़ल का प्रणेता कहा जाता है। यह कृति अनेक प्रमुख समकालीन ग़ज़लकारों के महत्वपूर्ण योगदान को विस्तार देती है।

Author

डॉ. अविनाश भारती

Format

Hardcover

ISBN

978-93-47306-7

Language

Hindi

Pages

204

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

आलोचना

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