वरिष्ठ ग़ज़लकार प्यासा अंजुम जी का यह ग़ज़ल-संग्रह अनुशासन, साधना और सृजनात्मक साहस का अद्वितीय दस्तावेज़ है। प्यासा अंजुम जी ने इस कृति में एक ही बहर में कही गई 444 ग़ज़लों को एक साथ प्रस्तुत कर हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल परंपरा में एक ऐसा प्रयोग रचा है, जिसकी मिसाल विरल है। यह संग्रह ग़ज़ल की पारंपरिक रूह को अक्षुण्ण रखते हुए समकालीन संवेदना, सामाजिक विवेक और निजी अनुभूति-तीनों को एक ही साँस में साधता है।
इस पुस्तक की एक बड़ी विशेषता है-इल्म-ए-अरूज़ के प्रति लेखक की गहरी समझ और पाठक के प्रति ईमानदार संवाद। संग्रह के प्रारंभमें बहर और वज़न की संक्षिप्त, लेकिन सारगर्भित जानकारी देकर प्यासा अंजुम ने ग़ज़ल को केवल रसात्मक अनुभव नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सीखने समझने की खुली ज़मीन भी दी है। यही कारण है कि ‘ग़ज़ाला’ नए पाठकों के लिए प्रवेश-द्वार है और साधकों के लिए अभ्यास-भूमि।
| Author | प्यासा अंजुम |
|---|---|
| Format | Hardcover |
| ISBN | 978-81-997250-7-2 |
| Language | Hindi |
| Pages | 264 |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |
| Genre | ग़ज़ल |



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