(घर-आँगन की लघुकथाएँ)
लघुकथा में कथानक हो या घटना-दुर्घटना, विस्तार नहीं दिया जा सकता। बावजूद इसके एक पूरी कहानी का कहा जाना ज़रूरी होता है। एक सधे से बिन्दु पर पाठक को उसके विचार प्रवाह के साथ छोड़ देना होता है। कभी कोई प्रश्न उठाते तो कभी कोई सलाह देते हुए लघुकथा मन पर अपना प्रभाव छोड़ जाये, यही साहित्य की इस शैली का सबसे सुंदर पक्ष है। मेरा यह लघुकथा संग्रह ‘ड्योढ़ी से व्योम तक’ इंसानी मन-जीवन से जुड़े ऐसे ही कुछ दृश्यों को शब्दों में उतारने का प्रयास है। इन कहानियों में घर-परिवार से गगन तक उड़ान भरती मानवीय सम्वेदनाओं को समेटने की कोशिश की है।
– डॉ. मोनिका शर्मा



Reviews
There are no reviews yet.