साहित्य एक ‘आकाश’ ही तो है। अलग-अलग विधाएँ साहित्य की ‘दिशाएँ’ ही तो हैं। डॉ. भावना अब बड़ी हैं, वरिष्ठ हैं, समझदार हैं, भावुक हैं, अनुभवी हैं। अब उनके बड़े-बड़े डैने हैं। उन्होंने हंस की तरह लम्बी उड़ान भर कर साहित्य के सात समन्दर पार किये हैं। वे विस्तृत आकाश के चारों और चक्कर लगाने में सक्षम हैं। ग़ज़ल की पीठ पर सवार होकर उड़ान भरना उन्हें रुचिकर लगता है और अपने गंतव्य तक पहुँचने का सही माध्यम भी।
वे भाग्यशाली हैं। किचिन से लेकर कॉलेज तक उनके रास्ते में ग़ज़लें बिखरी पड़ी होती हैं। वे झुकती हैं और सिक्के की तरह उन्हें उठा लेती हैं। फिर सलीके से शेरों में ढाल देती हैं। घर का कोना-कोना, छत, दीवारें, आँगन, कमरे, पेड़-पौधे, अमरूद, कौवे, कोयल, कबूतर सब उन्हें रदीफ़, काफ़िये उपलब्ध करा देते हैं। कुछ ऐसा ही करिश्मा आप उनके इस ग़ज़ल-संग्रह में भी पाएँगे। उनकी ग़ज़लें वक़्त की लहरों पर जहाज की तरह तैरती हैं।
-दिनेश प्रभात



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