व्यंग्य का उद्देश्य सम्बंधित व्यवस्था के दोषों को आलोचनात्मक शैली के सम्मिश्रण सहित सामने लाना होता है इसलिए व्यंग्यकार उसमें हास्य का पुट भरने का प्रयास भी करता है। ऐसा करके जहाँ वह किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाने के भाव से मुक्त रहता है वहीं अव्यवस्था की, स्थिति की तीक्षणता, कठोरता को भी सामान्य रूप में सबके बीच रखता है।
व्यंग्य लेखन के अपने लघु प्रयास में लगा कि जब अव्यवस्थित व्यवस्था की हास्य-युक्त आलोचना ही करनी है तो उसका रसमयी संस्करण प्रस्तुत किया जाये। इस रस में परिहास हो पर उपहास न हो, आलोचना हो पर फजीहत न हो। इस विचार के साथ जब ‘छीछालेदर रस’ का प्रकटन हुआ।
| Author | कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र |
|---|---|
| Format | Paperback |
| ISBN | 978-93-49947-98-6 |
| Language | Hindi |
| Pages | 80 |
| Genre | व्यंग्य |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |



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