जय चक्रवर्ती सहज भाषा में कठोर जीवन-यथार्थ को रखने वाले ऐसे ग़ज़लकार हैं जिनकी ग़ज़लों में संवेदना का प्रकर्ष चित्रात्मक रूप में परिलक्षित होता है। यह जीवन की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करती हैं। साम्यवादी विचारों से लेकर बुद्धिगत परिकल्पनाओं तक यात्रा करती इनकी ग़ज़लें संघर्ष के लिए आंदोलित करते हुए पीड़ाओं के उन्मूलन के लिए ऊर्जा प्रदान करती हैं। इनकी ग़ज़लों का दृष्टिकोण अनुभवजनित भावनाओं से निर्मित है। चिंतन इनकी ग़ज़लों की आधारशिला और व्यंग्य इनका जाग्रति स्त्रोत है। यही कारण है कि इनके पास ऐसे सरोकार हैं जो रचनाकार को उसकी सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के प्रति जिम्मेदार बनाता है। जय चक्रवर्ती एक रचनाकार के रूप में सियासत नहीं करते हैं बल्कि उस विपक्ष की भूमिका निभाते हैं जो सत्ता की आँख में आँख डालकर उससे सवाल कर सके। सौहार्द की भावना और आपसी सद्भाव के मूलमंत्र के साथ अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने वाला यह ग़ज़लकार व्यक्ति और समाज को उसकी अहमियत से रूबरू कराना चाहता है।
| Author | जय चक्रवर्ती |
|---|---|
| Format | Hardcover |
| ISBN | 978-93-49947-53-5 |
| Language | Hindi |
| Pages | 112 |
| Genre | ग़ज़ल |
| Publisher | Shwetwarna Prakashan |



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