हिन्दी ग़ज़ल का इतिहास केवल उसकी शिल्पगत यात्रा का इतिहास नहीं है, बल्कि वह उन स्वरों का भी इतिहास है जिन्होंने समय, समाज और मनुष्य की पीड़ा को अपनी संवेदना में समेटकर उसे कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की। लंबे समय तक हिन्दी ग़ज़ल का परिदृश्य मुख्यतः पुरुष रचनाकारों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा, किंतु पिछले कुछ दशकों में महिला ग़ज़लकारों ने अपनी सशक्त उपस्थिति से इस धारणा को निर्णायक रूप से बदला है। उन्होंने ग़ज़ल को केवल प्रेम और विरह की पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि स्त्री-अस्मिता, सामाजिक विषमता, पारिवारिक विडम्बनाओं, लोकतांत्रिक प्रश्नों, मानवीय संबंधों तथा प्रतिरोध की नई चेतना से समृद्ध किया।
‘हिन्दी ग़ज़ल का स्त्री स्वर : संवेदना, सरोकार और प्रतिरोध’ इसी परिवर्तनशील रचनात्मक परिदृश्य का गंभीर और शोधपरक दस्तावेज़ है। इस पुस्तक में समकालीन हिन्दी की प्रमुख महिला ग़ज़लकारों की रचनाशीलता का विवेचन करते हुए उनके कथ्य, शिल्प, भाषा, बिंब-विधान और वैचारिक पक्ष का सम्यक् मूल्यांकन किया गया है। यह कृति न केवल हिन्दी ग़ज़ल में स्त्री-सृजन की विशिष्ट पहचान स्थापित करती है, बल्कि यह भी प्रमाणित करती है कि स्त्री-स्वर आज हिन्दी ग़ज़ल की विकास-यात्रा का अनिवार्य और सशक्त अध्याय है। शोधार्थियों, अध्यापकों, विद्यार्थियों, ग़ज़ल-प्रेमियों तथा हिन्दी साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए यह पुस्तक एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ सिद्ध होगी।



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