गुंजित हुए दिगंत / भीमराव ‘जीवन’ बैतूल

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लोक चेतना के धरातल पर सक्रिय सृजनशील कवियों ने नवगीत के माध्यम से समाज के व्यापक वर्गों की सहभागिता सुनिश्चत की है। उन्होंने जन-जीवन की तकलीफों, समय और समाज की विसंगतियों को रेखांकित कर कवि-धर्म निभाया है। वैसे भी जब समाज में संवादों पर सन्नाटा पसरने लगता है, जब व्यवस्था की विसंगतियाँ आम आदमी की साँसों को घोटने लगती हैं, तब एक कवि का दायित्व होता है कि वह अपनी लेखनी को मशाल बनाकर अंधकार के सीने को चीर दे। भीमराव ‘जीवन’ बैतूल का सद्यः प्रकाशित नवगीत-संग्रह ‘गुंजित हुए दिगंत’ इसी दायित्व-बोध का एक सशक्त प्रमाण है।
अपने पहले नवगीत संग्रह ‘मदनी की महक’ से आगे की यात्रा करते हुए उन्होंने अपने कथ्य को और अधिक संप्रेषणीय तथा तीक्ष्ण बनाया है। पहले संग्रह की भाँति ही इस संग्रह में भी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक संदर्भों को उन्होंने शब्दायित किया है। लेकिन यह कहना उचित होगा कि उनके नवगीतों में राजनीतिक व्यंग्य की धारा सबसे प्रखर है। वे किसी लाग लपेट के बिना सत्ता के चरित्र और व्यवस्था की खामियों पर सीधा प्रहार करते हैं। इस मूक और बधिर वर्तमान को देखते हुए यह साहस प्रशंसनीय जान पड़ता है।

Author

भीमराव ‘जीवन’ बैतूल

Format

Paperback

ISBN

978-93-47306-72-3

Language

Hindi

Pages

120

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

नवगीत

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