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हिन्दी ग़ज़ल अनवरत / डॉ. रेणुका श्रीवास्तव

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डॉ. रेणुका श्रीवास्तव की कृति ‘हिन्दी ग़ज़ल अनवरत’ हिन्दी ग़ज़ल की विकास-यात्रा को समझने का एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक प्रयास है। यह पुस्तक ग़ज़ल की आरम्भिक पृष्ठभूमि से लेकर उसके समकालीन विस्तार तक को सुविचारित ढंग से प्रस्तुत करती है। इसमें ग़ज़ल के उद्भव, परिभाषा, विकास, दुष्यन्तोत्तर परिदृश्य, महिला ग़ज़ल लेखन, प्रवासी ग़ज़ल और वैश्विक संदर्भों में हिन्दी ग़ज़ल की उपस्थिति जैसे विविध आयामों का विवेचन किया गया है।
इस कृति की प्रमुख विशेषता यह है कि लेखिका ने ग़ज़ल की शिल्पगत जटिलताओं की अपेक्षा उसके भाव-जगत, संवेदना और सम्प्रेषणीयता को केन्द्र में रखा है। उनका यह दृष्टिकोण अत्यंत सार्थक है कि ग़ज़ल का पहला रिश्ता पाठक की संवेदना से बनता है। इसी कारण पुस्तक में ग़ज़ल के भावात्मक पक्ष को विशेष महत्व दिया गया है, जिससे पाठक न केवल जानकारी प्राप्त करता है, बल्कि ग़ज़ल की आत्मा से भी जुड़ता है।
आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह कृति हिन्दी ग़ज़ल की निरन्तर परम्परा को एक रेखा में देखने का प्रयास करती है—अमीर खुसरो, कबीर, भारतेन्दु और दुष्यन्त कुमार से लेकर समकालीन रचनाकारों तक। यह निरन्तरता केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि संवेदनात्मक और वैचारिक भी है। पुस्तक में ग़ज़ल के माध्यम से व्यक्त लोक-संवेदना, सामाजिक सरोकार, प्रेम, पीड़ा, प्रतिरोध और व्यंग्य जैसे विविध पक्षों को उदाहरणों सहित रेखांकित किया गया है, जो इसकी आलोचना को प्रमाणिकता प्रदान करते हैं।

Author

डॉ. रेणुका श्रीवास्तव

Format

Hardcover

ISBN

978-81-69342-50-6

Language

Hindi

Pages

392

Publisher

Shwetwarna Prakashan

Genre

आलोचना

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