विदुषी छाया शुक्ला जी वर्तमान समय की एक सशक्त एवं प्रसिद्ध कवयित्री हैं। जिस प्रकार दुष्यंत कुमार ने परिष्कृत हिंदी का मोह छोड़कर ग़ज़ल को आम आदमी की हिंदी ज़बान दी। ठेठ तेवर और बेबाक ढंग से दिल की गहराई तक पहुँचने की हैसियत दी। उसी प्रकार छाया जी की ग़ज़लों में जीवन है। संवेदना की गहराई है। लोक की मंगलकामना है। ग़ज़लों के माध्यम से इन्होंने सनातन सत्य को स्थापित किया है। भारतीय संस्कृति, संस्कार और परंपराओं को वाणी दी है। शब्द, शिल्प और भावों के माध्यम से ग़ज़लों में सत्य सनातन को स्थापित करने का गुरुतर प्रयास किया है।
छाया जी देश समाज और साहित्य के प्रति गहन आस्था रखती हैं। उनकी उदारता एवं रचनाधर्मिता अत्यंत चमत्कृत एवं तेजोमय है। रचनाओं में कुंठाओं का शोर नहीं, बल्कि विधिक विरोध का जोर है। जो भी है संतुलित और मर्यादित है। जीवन के सौंदर्य के साथ-साथ पारिवारिक ताना-बाना, आध्यात्मिकता का मनोहर इंद्रधनुषी रंग है तथा अपेक्षित, वंचित, लांछित और बेरोज़गारों-मज़दूरों की समस्याओं का अद्भुत चित्रण है। ग़ज़लों में भावनाओं की धूप अर्थों की छाया को वासंती गर्माहट प्रदान करती है।
– हीरालाल मिश्र ‘मधुकर’



Reviews
There are no reviews yet.