श्रीमती राजकांता जी का पहला ग़ज़ल-संग्रह ‘चाक पर नेमतें’ न केवल उनकी रचनाशील यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, बल्कि यह उस संवेदनशील हृदय की प्रस्तुति भी है, जो जीवन को बहुआयामी रूप में देखता और महसूस करता है। उनकी ग़ज़लों में रिश्तों की गरमाहट, सामाजिक सरोकार, प्रेम की सौम्यता, और जीवन के भीतर छिपी धैर्यपूर्ण शक्ति सहजता से अभिव्यक्त होती है।
राज कांता जी की अभिव्यक्ति में कृत्रिमता नहीं, बल्कि वही मिट्टी की सौंधी सुगंध है जो भारतीय जन-जीवन की सरल मगर गहरी भावनाओं से निकलती है। उनके शब्दों में वह सहज आत्मीयता है, जो पाठक को सीधे हृदय तक ले जाती है।
-समीर परिमल



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